Assembly Election 2027: यूपी समेत 5 राज्यों में चुनाव की तैयारियां तेज, 15 दिसंबर के बाद कभी भी हो सकता है तारीखों का ऐलान

नई दिल्ली/लखनऊ। देश के सियासी गलियारों में एक बार फिर चुनावी बिगुल बजने की हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां वोटर लिस्ट के पूर्व निरीक्षक यानी एसआईआर अभियान को लेकर विपक्षी दल लगातार चुनाव आयोग के निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं और विरोध प्रदर्शन करते जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग इन तमाम सियासी विवादों से बेपरवाह होकर अपने सबसे बड़े काम में जुट गया है। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश,  उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर इन पांच राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारी पूरी रफ्तार से शुरू भी कर दी है।

आज हम समझेंगे कि इन पांच राज्यों में चुनाव की तारीखों का ऐलान कब तक हो सकता है। चुनाव आयोग की टीमों का क्या प्लान है और सबसे अहम बात यह कि चुनावों में इस्तेमाल होने वाली वोटिंग मशीनों यानी ईवीएम की जांच को लेकर क्या नया अपडेट सामने आया है। उत्तर प्रदेश समेत इन पांच राज्यों में चुनाव की तारीखों की घोषणा कब तक होने की उम्मीद है? 

सूत्रों से मिली ताजा जानकारी के मुताबिक आयोग ने राज्यों में जमीनी स्तर पर चुनावी व्यवस्थाओं को परखने के लिए अपने वरिष्ठ अधिकारियों की टीमें भेजना शुरू कर दिया है। इसके तहत पहली आधिकारिक टीम उत्तराखंड के दौरे पर रवाना हो चुकी है। आयोग का पूरा रोड मैप इस तरह तैयार किया गया है कि 15 दिसंबर तक पांचों राज्यों के तमाम प्रशासनिक और चुनावी दौरे पूरे कर लिए जाएं। चुनाव आयोग के इस परंपरा के अनुसार जब आयोग के सभी जमीनी दौरे पूरे हो जाते हैं तो उसके बाद कभी भी चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया जाता है। अब ऐसे में यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि 15 दिसंबर के बाद किसी भी दिन इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित की जा सकती हैं। 

अगर हम पिछले 2022 के चुनावों को देखें तो उस वक्त इन राज्यों के चुनाव का ऐलान 8 जनवरी को हुआ था। लेकिन इस बार तैयारियां उससे भी पहले मुकम्मल की जा रही हैं। अब समझ लेते हैं कि चुनाव आयोग के अधिकारियों और खुद मुख्य चुनाव आयुक्त का इन राज्यों में जाने का क्या कार्यक्रम तय हुआ है। आयोग की योजना के मुताबिक अफसरों के स्तर पर चुनावी तैयारियों को परखने का काम 15 नवंबर तक पूरी तरीके से खत्म कर लिया जाएगा। इसमें उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी चार राज्यों यानी उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर का दौरा आयोग के अधिकारी इसी अक्टूबर महीने में ही पूरा करने वाले हैं। वहीं उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में तैयारियों की जटिलता को देखते हुए अफसरों की टीमें नवंबर के पहले या दूसरे हफ्ते में लखनऊ और अन्य जिलों का रुख करेंगी। 

जब अफसरों की टीमें अपने विस्तृत रिपोर्ट आयोग को सौंप देंगी, उसके तुरंत बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्त खुद इन सभी राज्यों के दौरे पर निकलने वाले हैं। यह मुख्य दौरा 15 दिसंबर तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। जिसके तुरंत बाद कभी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर चुनाव कार्यक्रम का ऐलान कर दिया जाएगा। लेकिन इस पूरी चुनावी हलचल के बीच जो सबसे बड़ा और तकनीकी अपडेट सामने आया है, वह है चुनावों के इस्तेमाल में होने वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की जांच का काम। चुनाव आयोग ने पांचों चुनावी राज्यों में ईवीएम के पहले चरण की सधन तकनीकी जांच शुरू कर दी है। जिसे प्रशासनिक भाषा में फर्स्ट लेवल चेकिंग यानी एलएफसी कहा जाता है। यह कोई साधारण जांच नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बेहद कड़ा और पारदर्शी प्रोटोकॉल होता है ताकि चुनाव से पहले किसी भी तरह के शक या गलती की कोई गुंजाइश ना बचे। 

यह पूरी प्रक्रिया जिला निर्वाचन अधिकारी यानी डीएम की सीधी निगरानी में होता है। जहां देश के दो प्रमुख सरकारी कंपनियों भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के अधिकृत और ट्रेंड इंजीनियर्स मशीनों की जांच करते हैं। इस पूरी जांच की सबसे बड़ी और अहम बात यह है कि यह किसी बंद कमरे में गुपचुप तरीके से नहीं होती बल्कि सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के अधिकृत प्रतिनिधियों की आंखों के सामने की जाती है। जांच शुरू होने से पहले आयोग बकायदा सभी दलों के नेताओं को लिखित सूचना भेजता है ताकि उनके प्रतिनिधि मौके पर मौजूद रहें। राजनीतिक दलों की मौजूदगी में ही ईवीएम रखने वाले वेयर हाउस के ताले और सील खोले जाते हैं। जांच करने वाले इंजीनियर्स को बकायदा पहचान पत्र देकर अंदर एंट्री भी दी जाती है और पूरे परिसर में कड़े सुरक्षा पहरे के साथ-साथ 24 घंटे सीसीटीवी कैमरों से लाइव रिकॉर्डिंग भी की जाती है ताकि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। 

इस एलएफसी प्रक्रिया के दौरान इंजीनियर्स मशीन के हर कलपुरजे यानी कंट्रोल यूनिट, बैलेट यूनिट और वीवीपैड की बारीकी से जांच करते हैं। वह यह तसल्ली करते हैं कि मशीन में लगे सभी हार्डवेयर असली हैं और सही तरीके से काम भी कर रहे हैं। हर एक मशीन की पूरी तरह साफ सफाई की जाती है और उसकी पुरानी बैटरीियों को हटाकर नई मूल बैटरी भी लगाई जाती हैं। इसके बाद राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के सामने ही हर मशीन का बकायदा मॉक पोल यानी फर्जी वोट डालकर यह देखा जाता है कि बटन दबाने पर सही वोट दर्ज हो रहा है या नहीं और वीवीपैड से ही सही पर्ची निकल रही है या फिर नहीं। जो मशीनें इस कड़े टेस्ट में पूरी तरीके से पास हो जाती हैं, उन पर ग्रीन स्लिप यानी हरी पर्ची लगाकर उन्हें राजनीतिक दलों के सामने ही सील करके स्ट्रांग रूम में सुरक्षित रख दिया जाता है।

तो फिर कुल मिलाकर देखा जाए तो एक तरफ दिल्ली से लेकर राज्यों तक राजनीतिक पार्टियां बयानों और आरोपों की सियासत में जुटी है। वहीं दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने 2027 के महा मुकाबले के लिए अपनी प्रशासनिक मशीनरी को पूरी तरीके से एक्टिव कर दिया है। 15 दिसंबर की समय सीमा यह साफ बताती है कि नए साल की शुरुआत के साथ ही देश के पांच बड़े राज्यों में चुनावी घमासान अपने चरम पर होगा। 

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