यूपी पंचायत चुनाव टलने की संभावना, राजनीतिक दलों की रणनीति, जनगणना 2027 और प्रशासनिक व्यस्तता बनी प्रमुख वजह

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनावों को लेकर अनिश्चितता गहराती नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार, राज्य में पंचायत चुनाव निर्धारित समय पर न होकर 2027 के विधानसभा चुनाव के बाद कराए जाने की संभावना बढ़ गई है। इसके पीछे जनगणना 2027 का कार्यक्रम, प्रशासनिक अमले की व्यस्तता और राजनीतिक दलों की रणनीतिक प्राथमिकताएं प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।

 

जानकारी के मुताबिक, 22 जनवरी को भारत के रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के कार्यालय ने 16वीं जनगणना का कार्यक्रम जारी किया है। यह जनगणना वर्ष 2027 में होगी और पहली बार पूरी तरह डिजिटल प्रक्रिया के तहत संपन्न कराई जाएगी। इसके तहत 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 तक हाउस लिस्टिंग का कार्य किया जाएगा, जबकि दूसरे चरण में 1 से 28 फरवरी 2027 तक जनसंख्या की गणना होगी।

 

जनगणना 2027
जनगणना 2027

 

जनगणना कार्य में व्यस्त रहेगा प्रशासनिक अमला

हाउस लिस्टिंग के दौरान उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में करीब 50 से 60 हजार शिक्षक, शिक्षामित्र, लेखपाल और अन्य संवर्ग के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाएगी। इसके अलावा जिलाधिकारियों से लेकर मुख्य विकास अधिकारी, उपजिलाधिकारी, तहसीलदार, नगर आयुक्त, अधिशासी अधिकारी और विकास खंड अधिकारियों को भी जनगणना कार्य में तैनात किया जाएगा। ऐसे में सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के पास पंचायत चुनाव कराने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन उपलब्ध न होने की स्थिति बन रही है।

 

मतदाता सूची पुनरीक्षण
मतदाता सूची पुनरीक्षण

 

मतदाता सूची पुनरीक्षण भी बनी बाधा

पंचायत चुनाव में देरी की एक अहम वजह मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान भी है। यह प्रक्रिया 27 मार्च को पूरी होगी और उसी दिन मतदाता सूचियों का अंतिम प्रकाशन किया जाएगा। राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग की योजना अप्रैल-मई में पंचायत चुनाव कराने की थी, लेकिन जनगणना कार्यक्रम जारी होने के बाद प्राथमिकताएं बदलती दिखाई दे रही हैं।

परिसीमन और पुनर्गठन की अधूरी प्रक्रिया

प्रदेश में ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन और परिसीमन की प्रक्रिया अभी जारी है। कई ग्राम पंचायतों को नगर निगम या नगर पालिकाओं में शामिल किया गया है। इसके चलते वार्डों की संख्या और सीमाओं में बदलाव होना है। जब तक वार्डों का अंतिम निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक आरक्षण और वोटर लिस्ट का काम अंतिम रूप नहीं ले सकता है।

 

राजनीतिक दल
राजनीतिक दल

 

राजनीतिक दलों की रणनीति भी संकेत दे रही देरी के

सूत्रों का कहना है कि सरकार और प्रमुख राजनीतिक दल भी पंचायत चुनाव समय पर कराने के पक्ष में नहीं हैं। भाजपा के सूत्रों के अनुसार, विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव कराने से कई राजनीतिक जोखिम सामने आ सकते हैं। गांव स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच आपसी रंजिश बढ़ने और टिकट वितरण से नाराज कार्यकर्ताओं के अन्य दलों में जाने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा जिला पंचायत और क्षेत्र पंचायत स्तर पर कमजोर प्रदर्शन का असर सीधे विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।

बताया जा रहा है कि पार्टी और सरकार की कोर ग्रुप बैठकों में भी पंचायत चुनाव को विधानसभा चुनाव के बाद कराने के विकल्प पर चर्चा हुई है। समाजवादी पार्टी सहित अन्य दल भी सितंबर के बाद पंचायत चुनाव कराने के पक्ष में नहीं माने जा रहे हैं।

पंचायती राज विभाग की तैयारी भी ठप

पंचायती राज विभाग की ओर से भी पंचायत चुनाव की तैयारियों के स्पष्ट संकेत नहीं मिल रहे हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने विभाग से पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण निर्धारण से जुड़ी सूची मांगी थी, जिसके लिए एक समिति का गठन आवश्यक होता है। यह समिति 2015 और 2021 के आरक्षण के आधार पर 2026 के लिए आरक्षण तय करती है, जिसमें लगभग दो महीने का समय लगता है। हालांकि, अब तक समिति गठन की प्रक्रिया भी शुरू नहीं की गई है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार विभाग के उच्च अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल पंचायत चुनाव को लेकर कोई ठोस तैयारी नहीं है और सरकार के स्तर से भी इसके संकेत नहीं मिले हैं। वहीं, पंचायत राज संस्थाओं से जुड़े जनप्रतिनिधियों का कहना है कि सरकार और संगठन की ओर से उन्हें बताया गया है कि चुनाव अभी नहीं होंगे।

चुनाव टलने पर प्रशासक होंगे नियुक्त

यदि पंचायत चुनाव निर्धारित समय पर नहीं कराए जाते हैं, तो ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्यों का कार्यकाल मई के पहले सप्ताह में समाप्त हो जाएगा। वहीं, ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्षों का पांच वर्षीय कार्यकाल जुलाई के पहले सप्ताह में पूरा होगा। ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों, ब्लॉकों और जिला पंचायतों में सक्षम अधिकारियों को प्रशासक या रिसीवर के रूप में नियुक्त किया जाएगा।

फिलहाल पंचायत चुनाव को लेकर अंतिम निर्णय राष्ट्रीय नेतृत्व की सहमति पर निर्भर माना जा रहा है। यदि केंद्रीय नेतृत्व समय पर चुनाव कराने के पक्ष में हुआ तो अप्रैल-मई में चुनाव संभव हैं, अन्यथा विधानसभा चुनाव 2027 के बाद पंचायत चुनाव कराए जाने की संभावना मजबूत मानी जा रही है।

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