नई दिल्ली: अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के व्यापारिक सलाहकार पीटर नवारो ने एक बार फिर से भारत के खिलाफ जहर उगला है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर दूसरे देशों में, खासकर भारत में एआई को बढ़ाने के लिए अमेरिकी पैसे का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है। आपको बता दें, नवारो का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और अमेरिका के रिश्ते लगातार गिरावट की ओर हैं। हालांकि, इसके बाद भी गूगल ने अगले 5 सालों में भारत में 15 बिलियन डॉलर के निवेश का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा चैटजीपीटी की मालिक कंपनी ओपनएआई भी भारत में अपने इन्फ्रस्ट्रक्चर में निवेश को बढ़ा रही है। इसके अलावा भारत जैसे दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में इन कंपनियों के यूजर्स बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं।
वाइट हाउस के पूर्व मुख्य रणनीतिकार स्टीव बैनन के साथ रियल अमेरिकाज वॉयस नामक कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए नवारों ने भारत के खिलाफ फिर से अपनी तल्खी जाहिर की। उन्होंने कहा,”अमेरिकी लोग भारत में एआई के लिए भुगतान क्यों कर रहे हैं? चैटजीपीटी अमेरिकी धरती पर संचालित होता है और अमेरिकी बिजली का उपयोग करता है, जो भारत, चीन और दुनिया भर के अन्य स्थानों में चैटजीपीटी के बड़े उपयोगकर्ताओं को सेवाएं प्रदान करता है।”
उन्होंने कहा, “यह चौंकाने वाली बात है, लेकिन इन एआई सेंटर्स के कारण बहुत ज्यादा बिजली की खपत की जा रही है और इनका ज्यादातर इस्तेमाल भारत और चीन जैसे देशों में चैटजीपीटी जैसी सुविधाओं को देने के लिए किया जा रहा है।”
ट्रंप ले सकते हैं ऐक्शन: नवारो
नवारो केवल शिकायत पर ही नहीं रुके, उन्होंने कहा कि इस मामले पर राष्ट्रपति ट्रंप नजर बनाए हुए हैं, जल्दी ही इस पर ऐक्शन लिया जा सकता है। उन्होंने कहा, “हम एआई डेटा सेंटर्स के कारण अमेरिका में बढ़ती बिजली की लागत पर बारीकी से नजर रखे हुए हैं। हम इस पर विचार कर रहे हैं। आप राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में इस पर कड़ी कार्रवाई की उम्मीद कर सकते हैं, इसलिए इस पर नजर रखें।”
भारत पर अपने कड़े रुख के लिए जाने जाने वाले नवारो इससे पहले भी अपना जहर उगल चुके हैं। पिछले एक साल के दौरान अपने बयानों को लेकर वह भारत और अमेरिका दोनों ही जगहों पर चर्चा में रहे थे। उन्होंने बार-बार भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापारिक नीतियों की चर्चा की थी। इतना ही नहीं उन्होंने भारत कै टैरिफ का महाराजा तक करार दिया था। वह नवारो ही थे, जिन्होंने भारत द्वारा की जा रही रूसी तेल की खरीद को यूक्रेन युद्ध से जोड़कर भारत पर युद्ध की फंडिंग करने का आरोप लगाया था। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने उनकी टिप्पणियों को अस्वीकार्य और गलत जानकारी के आधार पर बता कर खारिज कर दिया था।

